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परमाणु : द स्टोरी ऑफ पोखरण मूवी रिव्यू

कलाकारजॉन अब्राहम,डायना पेंटी,बोमन ईरानी
निर्देशकअभिषेक शर्मा
मूवी टाइपऐक्शन,ड्रामा,इतिहास
अवधि2 घंटा 9 मिनट
‘हीरो वर्दी से नहीं इरादे से बनते हैं’ निर्देशक अभिषेक शर्मा और जॉन अब्राहम की ‘परमाणु : द स्टोरी ऑफ पोखरण’ बिना वर्दी वाले उसी हीरो की दास्तान बयान करती है, जिसने अमेरिका की नाक के नीचे 1998 में पोखरण में न केवल 5 सफल परमाणु परीक्षण करवाए बल्कि देश को दुनिया भर में न्यूक्लियर एस्टेट का दर्जा देकर भारत को दुनिया के शक्तिशाली देशों में शामिल करवाया।

कहानी की शुरुआत 1995 के दौर से होती है, जहां इरादों का पक्का और देशभक्त अश्वत रैना (जॉन अब्राहम) अनुसंधान और विश्लेषण विभाग का एक ईमानदार सिविल सेवक है। वह प्रधानमंत्री के कार्यालय में भारत को न्यूक्लियर पावर बनाने की पेशकश करता है। मीटिंग में पहले उसका मजाक उड़ाया जाता है फिर उसका आइडिया चुरा लिया जाता है। अश्वत की गैरजानकारी में किया गया वह परीक्षण नाकाम जो जाता है और भ्रष्ट व्यवस्था की बलि चढ़ाकर उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया है। हताश और निराश अश्वत अपने परिवार के साथ मसूरी चला जाता है, जहां उसके साथ उसकी पत्नी सुषमा(अनुजा साठे) और उसका बेटा भी है। 3 साल बाद, सत्ता में बदलाव के बाद अश्वत को नए प्रधान मंत्री के प्रधान सचिव हिमांशु शुक्ला (बमन ईरानी) द्वारा वापस बुलाकर एक सीक्रेट टीम गठित करने के लिए कहा जाता है, जिसके बलबूते पर वह दोबारा परमाणु परीक्षण कर सके। अश्वत खुद को कृष्णा नाम देकर पांडव नाम की एक गुप्त टीम बनाता है। उसकी इस टीम में कैप्टन अंबालिका उर्फ नकुल (डायना पेंटी) के अलावा विकास कुमार, योगेंद्र टिंकू, दर्शन पांडेय, अभीराय सिंह,अजय शंकर जैसे सदस्यों को छद्म नाम देकर परमाणु परीक्षण की अलग-अलग अहम जिम्मेदारी दी जाती है। काबिल वैज्ञानिकों और आर्मी जवानों की इस टीम के साथ अश्वत निकल पड़ता है भारत का गर्व बढ़ाने के लिए, लेकिन उसके रास्त में रोड़ा बनते हैं अमेरिकी सेटेलाइट्स, पाकिस्तानी और अमेरिकी जासूस और मौसम की मार। तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए यह टीम परमाणु परीक्षण को कैसे गजब ढंग से अंजाम देती है, इसे देखने के लिए आपको सिनेमा हॉल जाना होगा।

फिल्म सत्य घटना पर आधारित है और अभिषेक शर्मा ने परमाणु परीक्षण जैसी गौरवशाली घटना को दर्शाते हुए निर्देशक के रूप में अपनी जिम्मेदारी का वहन किया है। जहां तक संभव हो सके उन्होंने किरदारों से लेकर लोकेशन तक हर चीज को रियल रखने की कोशिश की है। फिल्म का थ्रिल एलिमेंट आपको बांधे रखता है और उसी के साथ फिल्म के बीच-बीच में 90 के दशक की रियल फुटेज कहानी को और ज्यादा विश्वसनीय बनाते हैं। मध्यांतर तक फिल्म धीमी है, मगर सेकंड हाफ में यह गति पकड़ती है और क्लाइमैक्स में गर्व की अनुभूति करवाती है। बता दें कि 90 के दशक में जहां एक तरफ दुनिया के कई देश भारत के खिलाफ थे, वहीं परमाणु परीक्षण के बाद एक-एक करके भारत एक और शक्तिशाली देशों की संख्या में गिना जाने लगा। देशभक्ति से ओतप्रोत चुटीले संवादों के लिए लेखक सेवन क्वाद्रस, संयुक्ता चावला शेख और अभिषेक शर्मा को श्रेय दिया जाना चाहिए। परमाणु परीक्षण के दौरान सुरक्षा प्रक्रिया की बारीकियों को नजरअंदाज किया गया है। अभिनय के मामले में जॉन अब्राहम इस बार बाजी मार ले गए हैं। अश्वत के रोल में कहीं भी ऐक्शन हीरो और माचो मैन जॉन नजर नहीं आए। फिल्म में उन्होंने कदाचित पहली बार मार भी खाई है। डायना पेंटी अपनी भूमिका में दमदार लगी हैं। अनुजा साठे जॉन की पत्नी की भूमिका में खूब जमी हैं। विकास कुमार, योगेंद्र टिंकू, दर्शन पांडेय, अभीराय सिंह,अजय शंकर जैसे कलाकारों ने उम्दा अभिनय किया है। एक लंबे अरसे बाद हिमांशु शुक्ला की भूमिका में बोमन ईरानी अपने पुराने रंग में नजर आए हैं। फिल्म में उनकी मौजूदगी मजेदार साबित हुई है।