बेटी का हर रुप सुहान

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बेटी का हर रुप सुहाना, प्यार भरे हृदय का,

ना कोई ठिकाना, ना कोई ठिकाना।।

ममता का आँचल ओढे, हर रुप में पाया,

नया तराना, नया तराना।।

जीवन की हर कठिनाई को, हसते-हसते सह जाना,

सीखा है ना जाने कहाँ से उसने, अपमान के हर घूँट को,

मुस्कुराकर पीते जाना, मुस्कुराकर पीते जाना।।

क्यों न हो फिर तकलीफ भंयकर, सीखा नहीं कभी टूटकर हारना,

जमाने की जंजीरों में जकड़े हुये, सीखा है सिर्फ उसने,

आगे-आगे बढ़ते जाना, आगे-आगे बढ़ते जाना।।

बेटी का हर रुप सुहाना, प्यार भरे हृदय का,

ना कोई ठिकाना, ना कोई ठिकाना।।